12 मई 2019 - 14:08
क्या ट्रम्प से बात करने के लिए ईरान को उनके निजी मोबाइल नंबर की ज़रूरत है? ट्रम्प यह नंबर तेहरान को देने के लिए स्वीज़रलैंड की ख

दो दिन से भी कम समय में यह दूसरी बार है कि डोनल्ड ट्रम्प ईरानियों के आगे हाथ फैला रहे हैं और ईरानी अधिकारियों को वार्ता की मेज़ पर आने का निमंत्रण दे रहे हैं।

सीएनएन ने ख़ुलासा किया है कि वाइट हाउस ने ट्रम्प का निजी नंबर स्वीज़रलैंड की सरकार को पहुंचाया है कि वह इसे तेहरान सरकार को दे दे जो तेहरान में अमरीकी हितों के संरक्षक के रूप में काम करती है। स्वीज़रलैंड की सरकार ने यह काम करने से इंकार कर दिया क्योंकि ईरानी अधिकारियों ने इसकी इच्छा नहीं जताई है।

गत गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति ने पत्रकार सम्मेलन में ईरानी अधिकारियों को नए परमाणु समझौते के लिए वार्ता की मेज़ पर बैठने की दावत दी थी और यह वादा किया कि समझौता न्यायसंगत होगा बस ईरानी अधिकारियों को इतना ही करना है कि वह मुझसे संपर्क कर लें।

हमें नहीं लगता कि ईरानी अधिकारियों को ट्रम्प के निजी नंबर की ज़रूरत है कि उनसे बात करें। यदि ईरान चाहेगा तो इस देश के राष्ट्रपति डाक्टर रूहानी या विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ पत्रकार सम्मेलन करेंगे और एलान कर देंगे कि वह अमरीका की वार्ता की दावत को स्वीकार करते हैं। मगर ईरान ने यह नहीं किया क्योंकि ईरान अपनी स्पष्ट शर्तों पर क़ायम है जिन्हें दो बिंदुओं में बयान किया जा सकता है। एक तो यह कि ईरान पर लगे अमरीकी प्रतिबंध तत्काल हटाए जाएं और दूसरे यह कि अमरीका उसी परमाणु समझौते में वापस लौट आए जिससे वह बाहर निकला है।

ट्रम्प ईरानियों को वार्ता के लिए मनाने की कोशिश तब कर रहे हैं जब उन्हें विश्वास हो चुका कि धमकियां देने और समुद्री बेड़ा भेजने से ईरानी डरने वाले नहीं हैं।

ट्रम्प ने यही सारा खड़ाग उत्तरी कोरिया के मामले में भी किया था और उत्तरी कोरिया के शासक से दो मुलाक़ातों में ट्रम्प को बुरी तरह अपमानित होना पड़ा। उत्तरी कोरिया के नेता किम जोंग उन ने कोई भी दबाव स्वीकार करने और अनुचित मांग मानने से साफ़ इंकार कर दिया।

अमरीका की इस प्रकार की धमकियों से फार्स खाड़ी के अरब देशों विशेष रूप से सऊदी अरब के अलावा कोई भी डरने वाला नहीं है। ट्रम्प ने दस दिन में दूसरी बात कल सऊदी अरब को फिर याद दिलाया कि अमरीका सऊदी अरब की रक्षा करता है, सऊदी अरब धनी देश है उसके पास पैसे के अलावा कुछ नहीं है हम उसकी रक्षा करते हैं तो उसे चाहिए कि इसकी क़ीमत चुकाए।

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश सीनियर ने वर्ष 1990 में कुवैत युद्ध के बाद इराक़ के साथ यही रवैए अपनाया था। तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने इराक़ी विदेश मंत्री तारिक़ अज़ीज़ से जेनेवा में इसी प्रकार की बात की थी।

ईरान की सरकार की बात की जाए तो उसके पास बड़ा लंबा अनुभव है। उसके सामने लीबिया की क़ज़्ज़ाफ़ी सरकार का अंजाम भी है जिसने अमरीका पर भरोसा करके अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह समेट दिया था। उसके सामने इराक़ की सद्दाम सरकार का अंजाम भी है।

डोनल्ड ट्रम्प रियल स्टेट के मैदान के व्यापारी हैं। वह वहां कि अपने अनुभव विश्व राजनीति के मैदान में प्रयोग करना चाहते हैं इसीलिए उन्हें एक पराजय के बाद फौरन दूसरी पराजय का मुंह देखना पड़ रहा है। वह व्यापारियों की तरह बड़े डरपोक व्यक्ति हैं। उनमें ईरान से युद्ध करने की हिम्मत नहीं है।

हमें नहीं लगता कि ईरान अमरीका की धमकियों से तनिक भी प्रभावित होगा। ईरान अपनी शर्तों पर आख़िर तक डटा रहेगा। यदि अमरीका ने ईरान पर हमला करने की कोशिश की तो ईरान के पास सीरिया में लगभग 2000 और इराक़ में लगभग 6000 अमरीकी सैनिकों सहित अनेक अमरीकी हितों को निशाना बनाने जैसे अनेक विकल्प होंगे। रह गई यह बात कि इस्राईल अमरीका की क्या मदद कर सकता है? तो जवाब यह है कि इस्राईल से निपटने के लिए हिज़्बुल्लाह और जेहादे इस्लामी ही काफ़ी हैं।

 

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार